कार्यशील पूँजी का प्रबन्ध
(Management of Working Capital)


कार्यशील पूँजी का अर्थ (Meaning of Working Capital)

कार्यशील पूँजी का प्रबन्ध करना वित्तीय प्रबन्ध का एक महत्वपूर्ण कार्य होता है। व्यावसायिक उपक्रम में प्रयोग की जाने वाली स्थायी सम्पत्तियो जैसे भूमि, भवन, मशीन एवं संयंत्र आदि के कुशलतम उपयोग एवं दैनिक कार्यो के निर्बाध संचालन के लिए कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती है। कार्यशील पूंजी के प्रबन्ध का मुख्य उद्देश्य कार्यशील पूंजी के अनुकूलतम स्तर का निर्धारण करना होता है। एक कार्यशील पूंजी का अर्थ निम्नलिखीत दो अवधारणाओं की सहायता से समझा जा सकता है। 



Management of Working Capital and Arguments in Favour of Working Capital Concept
Management of Working Capital and Arguments in Favour of Working Capital Concept



(i) सकल कार्यशील पूंजी अवधारणा

कार्यशील पूंजी की इस अवधारणा के अनुसार कार्यशील पूंजी से अभिप्राय सकल कार्यशील पूंजी से होता है जिसमे व्यवसाय की सभी चालू सम्पत्तियो को सम्मिलित किया जाता है। 


सकल कार्यशील पूंजी अवधरणा के पक्ष में तर्क
(Arguments in Favour of Gross Working Capital Concept)


1. अधिकांश प्रबन्धक अपनी व्यवसायिक क्रियाओ की योजनाएं कुल चल सम्पत्तियो के आधार पर ही बनाते है। इसका मुख्य कार्य यह है कि व्यवसाय के दिन प्रतिदिन के कार्य संचालन में यही सम्पतियो काम मे आती है। 


2. जैसा कि हम जानते है कि कोषों की किसी भी प्राप्ति से कार्यशील पूंजी में वृद्धि होती है और यह बात इस अवधारणा से सत्य सिद्ध होती है। 


3. जब स्थायी सम्पत्तियो को स्थायी पूंजी का प्रतीक माना जाता तो चालू सम्पत्तियो को कार्यशील पूंजी का प्रतीक मानना चाहिए। 


4. चालू सम्पत्तियो की वित्त व्यवस्था चाहे अल्पकालीन ऋणों से की गई हो या दीर्घकालीन ऋणों से , इनकी उपयोगिता में कोई अंतर नही पड़ता है। इसलिए समस्त चालू सम्पत्तियो को ही कार्यशील पूंजी मानना चाहिए। 

(ii) शुद्ध कार्यशील पूंजी अवधारणा 

कार्यशील पूंजी की इस अवधारणा के अनुसार कार्यशील पूंजी से अभिप्राय शुद्ध कार्यशील पूंजी से अभिप्राय शुद्ध कार्यशील पूंजी से होता है जो चालू सम्पत्तियो का चालू दायित्वों पर आफ्हिकय होती है। 


शुद्ध कार्यशील पूंजी अवधारणा के पक्ष में तर्क

1. कार्यशील पूंजी की इस अवधारणा से यह ज्ञात होता है कि व्यवसाय के चालू दायित्वों का व्यवसाय की चालू सम्पत्तियो में से समय पर भुगतान किया जा सकेगा या नही। 


2. इस अवधारणा से व्यवसाय की आकस्मिक स्थितियों से सामना करने की क्षमता के बारे में पता चलता है। 


3. शुद्ध कार्यशील पूंजी अवधारणा से व्यवसाय की तरलता की स्थिति की जानकारी मिलती है। इसका कारण यह है वास्तव में तो कार्यशील पूंजी में केवल तभी वृद्धि होती है जबकि या तो लाभो का व्यवसाय में पुनर्वियोग किया जाए या दीर्घकालीन पूंजी प्राप्त की जाए। 


4. शुद्ध कार्यशील पूंजी अवधारणा के आधार पर ही व्यवसाय को अल्पकालीन ऋण उपलब्ध करवाने वाले ऋणदाता, बैंकर्स आदि व्यवसाय को ऋण देना या न देना तय करते है। 


5. इस अवधारणा को मानने का एक कारण यह भी है कि इसमें एक समान चालू सम्पत्तियो वाली दो व्यवसायिक संस्थाओ की वित्तीय स्थिति की तुलना करना सम्भव होता है। 


शुद्ध कार्यशील पूंजी अवधारणा के अनुसार यदि व्यवसाय की चालू सम्पत्तिया, चालू दायित्वों के बराबर है, तो शुद्ध कार्यशील पूंजी शून्य होगी। यदि व्यवसाय की चालू संपत्तियां, चालू दायित्व से कम है तो शुद्ध कार्यशील पूंजी ऋणात्मक होगी और यदि व्यवसाय की चालू सम्पत्तिया, चालू दायित्वों से अधिक है तो शुद्ध कार्यशील पूंजी धनात्मक होगी। 


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