कंपनी का समापन और समापन के प्रकार के बारे में जानकारी


हेलो दोस्तों। 

आज के पोस्ट में हम समापन के बारे में जानेंगे। चलो शुरू करते हैं। 

सबसे पहले समापन का अर्थ समझना जरूरी होगा!


समापन का अर्थ (Meaning of Winding up)

समापन का अर्थ उस वैधानिक रीति से है। जिसके द्वारा कंपनी का अंत हो जाता है। एक कंपनी कृत्रिम व्यक्ति होने के कारण व्यक्ति होने के कारण स्वाभाविक रूप से समाप्त नही होती। वास्तव में, उसका निर्माण अधिनियम द्वारा होता है और इसलिए अधिनियम द्वारा ही उसका अंत होता है। समापन का मुख्य उद्देश्य कंपनी की सम्पतियों को बेचकर उसके ऋण का भुगतान करना और आधिक्य धन को यदि कोई हो, उसके अंशधारियो में उनके समावित्व के आधार पर बांट देना है।
 


कंपनी का समापन और समापन के प्रकार के बारे में जानकारी
कंपनी का समापन और समापन के प्रकार के बारे में जानकारी




एक कंपनी का समापन उसी समय किया जाता है जब वह अधिक आर्थिक कठिनाई में पड़ जाती है, परन्तु इसके अतिरिक्त अन्य कारण भी हो सकते है, जैसे कई कंपनी भविष्य में हानि होने की संभावना से समाप्त कर दी जाए। कंपनी को कभी भी दिवालिया घोषित नही किया जा सकता भले ही वह अपने ऋण चुकाने में असमर्थ हो। कंपनी का केवल समापन किया जा सकता है। 


समापन के प्रकार (Modes of Winding Up)

कंपनी का समापन निम्नलिखित में से किसी भी प्रकारः किया जा सकता है। 


राष्ट्रीय अधिनियम न्यायाधिकरण के अंतर्गत अनिवार्य समापन।

(i) कंपनी के विशेष प्रस्ताव द्वारा - यदि कंपनी अपनी सभा मे इस आशय का विशेष प्रस्ताव पारित कर लिया है कि कंपनी का समापन किया जाए तो कंपनी का समापन किसी भी कारण के लिए किया जा सकता है। 


(ii) जहां कंपनी ने राष्ट्रीय हित के विरुद्ध कार्य किया है - यदि कंपनी ने भारत की एकता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यो से मैत्रीपूर्ण सम्बन्धो, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या नैतिकता के हितों 2013 की धारा 271 (स) के अन्तर्गत न्यायाधिकरण को कंपनी का समापन करने का अधिकार है। 


(iii) रजिस्ट्रार द्वारा समापन के लिए आवेदन करने पर - कंपनी रजिस्ट्रार द्वारा या केंद्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त सूचना द्वारा, प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किये गए आवेदन पर यदि न्यायाधिकरण की यह राय है कि कंपनी के कार्यकलापों का संचालन कपटपूर्ण रीति से किया गया है या उसके निर्माण या उसके कार्यकलापों के प्रबन्ध से सम्बंधित व्यक्ति, उसके सम्बन्ध में कपट, कर्तव्य भंग या दुराचार के दोषी रहे है तथा यय उचित होगा कि कंपनी का समापन कर दिया जाए। 


(iv) रजिस्ट्रार के पास वित्तीय ब्यौरे आदि फ़ाइल करने की त्रुटि - जहां कंपनी ने ठीक पूर्ववर्ती पांच क्रमवर्ती वित्तीय वर्षों के अपने वित्तीय ब्यौरे या वार्षिक विवरणी को रजिस्ट्रार के पास फ़ाइल करने में त्रुटि की है तो न्यायाधिकरण कंपनी के समापन
का आदेश दे सकता है।
 

(v) समय सीमा में व्यापार आरम्भ न करना या व्यापार निलंबित करना - यदि कंपनी अपने समामेलन के एक वर्ष के अंदर व्यापार आरम्भ करती है या एक वर्ष के व्यवसाय स्थगित रखरी है, तो न्यायाधिकरण इसके समापन का आदेश दे सकता है। न्यायाधिकरण का एक ऐच्छिक अधिकार है और वह तभी आदेश देता है यदि उसे विश्वास हो जाये कि कंपनी व्यापार नही करना चाहिए। परन्तु यदि व्यापार का स्थगन अल्पकालिक है या व्यापार स्थगित या देर से आरम्भ करने का कारण उचित है और न्यायाधिकरण ऐसे कारण से संतुष्ट है तथा कंपनी द्वारा व्यापार शीघ्र आरम्भ करने की संभावना है तो समापन का आदेश नही दिया जायेगा। 


(vi) उचित तथा न्याय संगत - यदि न्यायाधिकरण किसी कंपनी का समापन उचित तथा न्यायसंगत समझता है तो वह कंपनी के समापन का आदेश दे सकता है। इस शीर्षक के अंतर्गत न्यायाधिकरण को व्यापक अधिकार दिए गए है इसमें न्यायाधिकरण वह आधार शामिल कर सकता है जो उपरोक्त आधारों में नही आते। उचित तथा न्यायसंगत क्या है यह एक तथ्य सम्बन्धी प्रश्न है जो प्रत्येक मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। 


निम्नलिखित स्थितियां कंपनी के समापन के लिए उचित व न्यायसंगत समझी जाती है ;

1. जब कंपनी को लगातार हानि हो रही ही और भविष्य में लाभ की कोई संभावना न हो। 

2. यदि कंपनी का उद्देश्य गैर कानूनी हो या कपटपूर्ण व्यापार करना हो। 

3. यदि कंपनी की सम्पूर्ण अंशपुंजी नष्ट हो गयी हो और पूंजी प्राप्त होने की कोई आशा न हो। 

4. यदि कंपनी के प्रबन्ध में गतिरोध पैदा हो गया हो। 

5. यदि कंपनी के बहुसंख्यक अंशधारी कंपनी के अल्पसंख्यक अंशधारियो के प्रति आक्रमणकारी या दमनकारी नीति अपनाते हो। 

6. यदि कंपनी केवल मात्र एक बुलबुला हो मतलब की न वह व्यापार कर रही हो और न ही उसकी कोई सम्पति हो। 

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