Tax Planning in Relation to Profits and Gains of Business or Profession in Hindi



हेलो दोस्तों।

आज के पोस्ट में हम व्यापार या पेशे के लाभों के सम्बन्ध में कर नियोजन के बारे में जानेंगे। चलो शुरू करते है दोस्तों।



व्यापार या पेशे के लाभों के सम्बन्ध में कर नियोजन (Tax Planning in Relation to Profits and Gains of Business or Profession)


1. व्यापार की स्थापना का स्थान - वर्तमान में व्यापार की स्थापनबक स्थान बहुत महत्व रखता है क्योंकि विशिष्ट स्थानों में व्यापार स्थापित करने से कर की छूटें मिलती है। अतः व्यापार इसी ऐसे स्थान पर स्थापित करना चाहिए जहां इन छूटों का लाभ प्राप्त हो सके।


2. व्यापार की प्रकृति - कुछ व्यापार ऐसे होते है जिनके सम्बन्ध में कर की मुक्ति या लाभों के कुछ प्रतिशत की कटौती मिलती है। अतः व्यापार की प्रकृति ऐसी होनी चाहिए जिसके सम्बन्ध में कर से मुक्ति हो या कुछ कटौती हो।


3. यदि एकल व्यवसाय किया जा रहा है और इसके लिए रोकड़ की आवश्यकता है तो मित्रो एवं रिश्तेदारों से उपहार लेने की अपेक्षा ब्याज पर ऋण लेना चाहिए ताकि ब्याज की कटौती मिल सके।


4. एक व्यापारी को व्यापार के व्यय करने से पूर्व यह देख लेना चाहिए कि कहीं ये व्यय अस्वीकृत तो नही हो जायँगे। अत उसे वे व्यय करने चाहिए जो स्वीकृत हो तथा उन सीमाओं तथा शर्तों को पूरा करके करना चाहिए जिससे कि व्यय स्वीकृत हो जाये।


5. यदि कोई भवन, मशीन तथा सयंत्र या फर्नीचर गत वर्ष में 180 दिन से अधिक व्यापार में प्रयोग कर लिए जाए तो उन पर सम्पूर्ण वर्ष का ह्रास स्वीकृत होता है। अतः यदि मशीन तथा सयंत्र गत वर्ष में लगवा लिए जाए तो उसी वर्ष में कम से कम 180 दिन उसे व्यापार में अवश्य प्रयोग कर लिया जाए ताकि उस पर इसी गत वर्ष में भी ह्रास स्वीकृत हो सके।


6. विधि द्वारा प्रतिषिद्ध (रिश्व्त) व्यय नही किया जाना चाहिए, क्योकि आय की गणना करते समय इसकी कटौती नही मिलती।




पूंजी लाभों के सम्बन्ध में कर नियोजन (Tax planning in Relation to  Capital Gains)


1. यदि सम्पत्ति दीर्घकालीन पूंजी सम्पत्ति है तो पूंजी लाभ की गणना करने के लिए सम्पत्ति की प्राप्ति की लागत एवं सम्पत्ति में सुधार की लागत को स्फीति सूचकांक के आधार पर बढ़ा दिया जाता है। अतः जहां तक सम्भव हो सम्पत्ति को अल्पकालीन सम्पत्ति की अपेक्षा दीर्घकालीन सम्पत्ति होने पर बेचना चाहिए ताकि पूंजी लाभ की राशि कम हो सके।



Tax Planning in Relation to Profits and Gains of Business or Profession
पूंजी लाभों के सम्बन्ध में कर नियोजन



2. दीर्घकालीन पूंजी लाभ पर कम दर से कर लगता है।


3. प्राप्त पूंजी लाभ पर कर दायित्व कम करतर के लिए इसे अनुमोदित सम्पत्ति, बॉण्ड्स आदि में निर्धारित अवधि में विनियोजित कर देना चाहिए।


4. यदि किसी अंशधारी को अपने अंशों पर कंपनी से बोनस अंश मिलते है और बोनस अंश मिलने के बाद वह तुरन्त कुछ अंश बेचना चाहता है तो उसे मूल अंश बेचने चाहिए ताकि दीर्घकालीन पूंजी लाभ की राहत उसे मिल सके।


5. यदि अंशधारी सूचीकृत बोनस अंश बेचना चाहता है तो इनके आबंटन की तिथि से 12 महीने के बाद बेचना उचित होगा, क्योकि ऐसे दीर्घकालीन पूंजी लाभ पर 10 प्रतिशत की दर से कर लगेगा।


6. ह्रास होने वाली सम्पत्ति के विक्रय पर यदि पूंजी लाभ होता है तो अल्पकालीन पूंजी लाभ होता है। ऐसी दशा में अल्पकालीन पूंजी लाभ से बचने के लिए करदाता को चाहिए कि सम्पत्ति के उसी खण्ड में कोई अन्य सम्पत्ति उस गत वर्ष में क्रय करके पूंजी लाभ न रहने दे। इस प्रकार नई सम्पत्ति की कुछ लागत कर के बचाव से पूरी हो जाएगी।




अन्य साधनों से आय के सम्बन्ध में कर नियोजन (Tax Planning in Relation to Income from Other Sources)


1. एक ऐसी कंपनी जिसमे जनता का सारवान हित न हो , के ऐसे अंशधारी को जिसका उस कंपनी में सारवान हित हो , कंपनी के एकत्रित लाभों की सीमा तक कंपनी से कोई ऋण या अग्रिम नही लेना चाहिए, क्योकि वह धारा 2 (22) (e) के अंतर्गत कर योग्य लाभांश माना जाएगा।


2. जिन करदाताओं को अधिकतम दर पर कर चुकाना पड़ता है उन्हें कर मुक्त प्रतिभूतियों में विनियोग करना चाहिए।


3. अब घरेलू कंपनी के अंशो पर लाभांश एवं आपसी कोष के यूनिट्स पर आय कर मुक्त है अतः आयकर बचाने के लिए अंशों एवं यूनिट्स में विनियोग करना चाहिए। 

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