पुनर्मूल्यांकन खाते तथा वसूली खाते में अंतर


हेलो दोस्तों।

आज हम पुनर्मूल्यांकन खाते और वसूली खाते में अंतर समझेंगे।


पुनर्मूल्यांकन खाता तथा वसूले खाते में अंतर (Difference between Revaluation Account and Realisation Account)

1. बनाने की अवस्था या समय - पुनर्मूल्यांकन खाता फर्म के नए साझेदार के प्रवेश की अवस्था मे, अवकाश ग्रहण की अवस्था मे बनाया जाता है। और वसूली खाता फर्म के विघटन की अवस्था मे बनाया जाता है।


2. बनाने का उद्देश्य - पुनर्मूल्यांकन खाते बनाने का उद्देश्य सम्पत्तियों या दायित्वों के मूल्यों में समायोजन करना है और वसूली खाते को बनाने का उद्देश्य सम्पत्तियों की बिक्री एव दायित्वों के भुगतान से लाभ हानि ज्ञात करना है।



Difference between Revaluation Account and Realisation Account in Hindi
Difference between Revaluation Account and Realisation Account in Hindi




3. पुनर्मूल्यांकन खाता बनाए जाने के बाद भी फर्म चालू रहती है। केवल साझेदारी संगठन में परिवर्तन होता है। और वसूली खाता बनाए जाने के बाद फर्म बन्द हो जाती है।


4. पुनर्मूल्यांकन खाते में सम्पत्तियों तथा दायित्वों के केवल पुस्तकीय मूल्यों तथा संशोधित मूल्यों के अंतर का लेखा किया जाता है। और वसूली खाते में सम्पत्तियों तथा दायित्वों के पुस्तकीय मूल्य, सम्पत्तियों के विक्रय मूल्य तथा दायित्वों को वास्तविक भुगतान की गई राशि का लेखा किया जाता है।


5. पुनर्मूल्यांकन खाता एक फर्म के जीवन काल मे कई बार बनाना पड़ सकता है। और वसूली खाता एक फर्म के जीवन काल मे केवल एक बार बनाया जाता है।

तो दोस्तों। ये थी जानकारी पुनर्मूल्यांकन खाते और वसूली खाते के बारे में।



साझेदारों के ऋण खाते - यदि किसी साझेदार ने फर्म को ऋण दिया है तो उसका भुगतान बाहरी ऋणों का सम्पूर्ण भुगतान करने के बाद ही किया जाएगा। अतः साझेदार के ऋण खाते को वसूली खाते में हस्तांतरित नही किया जाता है बल्कि इसके लिए एक अलग खाता बनाया जाता है ऋण की राशि की इस खाते में क्रेडिट में लिखकर निम्न प्रविष्टि द्वारा भुगतान करके ये खाता बन्द कर दिया जाता है :

Partner's Loan A/c                                  Dr.
      To Cash/Bank A/c
(Payment of partner's Loan)



साझेदारों के पूंजी खाते - साझेदारो के पूंजी खातों में वसूली खाते का लाभ/हानि, बिना बंटे लाभ, संचय, यदि किसी साझेदार ने कोई सम्पत्ति ली है। तो उसका लेखा एवं यदि कोई दायित्व लिया है तो उसका लेखा तथा अन्य सभी लिखे होने के बाद :-

(i) किसी साझेदार द्वारा पूंजी की कमी का रुपया लाने पर

Cash/Bank A/c                                      Dr.
       To partner's Capital A/c
(Required cash brought in by the partner)


(ii) किसी साझेदार को पूंजी का भुगतान करने पर

(Partner's Capital A/c                           Dr.
            To Cash/Bank A/c
(Excess cash paid to partner)



रोकड़ या बैंक खाता - इस खाते के डेबिट पक्ष में प्रारम्भिक शेष लिखकर सभी प्राप्त होने वाली राशियां इसके डेबिट में व सभी भुगतान इसके क्रेडिट में लिख देते है। यह खाता सबसे अंत मे बनाया जाता है। इस खाते के दोनों पक्षों का जोड़ समान होता है। अतः इस खाते से प्रश्न की गणितीय शुद्धता की जांच भी हो जाती है। 

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