गार्नर बनाम मरे नियम हिंदी में जाने


हेलो दोस्तों।

आज के पोस्ट में हम गार्नर बनाम मरे नियम के बारे में जानेंगे।


गार्नर बनाम मरे का नियम (Rule of Garner Vs. murray)

गार्नर, मरे तथा विल्किन्स तीन साझेदार थे। तीनो की पूंजी में काफी अंतर था। परंतु वे समान अनुपात में लाभ हानि बांटते थे। जिस तिथि को विल्किन्स दिवालिया हुआ उस दिन उनके पूंजी खातों के शेष निम्नलिखित थे :

Garner £ 2,500 (cr.) ; Murray £ 314 (cr.); Wilkins £ 263 (Dr.) । वसूली की हानि 636 £ (पौंड) हुई और इसे समान अनूपात में बांटने के बाद विल्किन्स के पूंजी खाते का डेबिट शेष 475 £ हो गया। विल्किन्स दिवालिया हो गया और उसकी निजी सम्पत्तियों से कुछ भी प्राप्त नही हुआ। गार्नर यह चाहते थे कि विल्किन्स के खाते की इस 475 £ की हानि को लाभ विभाजन अनुपात अर्थात समान अनुपात में सहन किया जाना चाहिए परन्तु मरे (murray) ने यह तर्क दिया कि विल्किन्स के दिवालिया होने के कारण जो हानि हुई है वह व्यावसायिक हानि न होकर पूंजीगत हानि है। अतः इसे पूंजी के अनुपात में सहन करना चाहिए।




Rule of Garner Vs. murray in Hindi
Rule of Garner Vs. murray in Hindi  




विवाद को न्यायालय में प्रस्तुत किया गया और न्यायाधीश जायस द्वारा निम्नलिखित निर्णय दिया गया :


1. वसूली खाते द्वारा प्रकट हानि को सभी साझेदार (दिवालिया साझेदार सहित) अपने लाभ हानि विभाजित करेंगे और गैर दिवालिया साझेदार अपने हिस्से की वसूली की हानि को नोद लाएंगे।


2. दिवालिया साझेदार के पूंजी खाते द्वारा प्रदर्शित कमी को सभी गैर दिवालिया साझेदार अपनी पूंजी के अनुपात में सहन करेंगे।


3. पूंजी का अनुपात फर्म के विघटन से पहले बनाए गए स्थिति विवरण में दिखाई गई पूंजी के आधार पर निकाला जाएगा।


पूंजी का अनुपात निकालने के लिए यह देखना जरूरी है कि साझेदारों की पुंजिया स्थायी है या परिवर्तनशील।

(अ) स्थायी पूंजी की दशा में - यदि साझेदारों ने स्थायी पूंजी पद्धति अपनाई है तो जो पूंजी स्थिति विवरण में लिखी हुई होगी, उसी के अनुपात में दिवालिया साझेदार की कमी को बांटा जाएगा। ऐसी दशा में संचित लाभ हानियो, संचयो, पूंजी पर ब्याज, आहरण और आहरण पर ब्याज आदि से सम्बंधित सभी समायोजित चालू खातों में किए जाते है।


(ब) परिवर्तनशील पूंजी की दशा में - यदि साझेदारों ने परिवर्तनशील पूंजी पद्धति अपनाई है तो सभी संचित लाभ हानियों, संचयों, पूंजी पर ब्याज, आहरण और आहरण पर ब्याज के समायोजन के बाद जो परिवर्तित पूंजियां आएंगी उन्ही कर अनुपात में दिवालिया साझेदार की कमी को बांटा जाएगा।



इस नियम का भारत मे प्रयोग - भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932, गार्नर बनाम मरे के विवाद में दिए गए निर्णय का विरोध नही करता है। अतः यदि प्रश्न में कोई स्पष्ट निर्देश नही है तो प्रश्न हल करते समय इसी नियम का पालन करना चाहिए। परन्तु भारत मे यह नियम कुछ परिवर्तन कर साथ लागू किया जाता है। परिवर्तन यह है कि भारत के वसूली खाते की हानि को गैर दिवालिया साझेदारों द्वारा नकदी में लाने की जरूरत नही है क्योंकि बाद में इसे इन्ही साझेदारों को लौटाना होगा। अतः

(i) दिवालिया साझेदार की पूंजी खाते की कमी को अन्य और गैर दिवालिया साझेदारों में उनकी पूंजी के अनुपात में ही विभाजित करना चाहिए।


(ii) यदि प्रश्न में स्पष्ट रूप से यह लिखा हुआ है कि गार्नर बनाम मरे के नियम का पालन कीजिए तब तो वसूली खाते की हानि को गैर दिवालिया साझेदार नकदी में लाएंगे वरना नही। 

Post a Comment