अभिगोपन कमीशन के बारे में जानकारी


हेलो दोस्तों।

आज के पोस्ट में हम अभिगोपन कमीशन के बारे में जानेंगे।


अभिगोपन कमीशन (Underwriting Commission)

जनता को अंशदान के लिए प्रस्तावित अंशों, एक ऋणपत्रों के जनता द्वारा लिए जाने के जोखिम से सुरक्षा जोखिम में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक कंपनियों में आजकल एक आम रिवाज हो गया है कि वे कमीशन के बदले अपने अंशों एवं ऋणपत्रों का उनके निर्गमन से पहले अभिगोपन करा लेती है। इस प्रकार अभिगोपन एक व्यक्ति या सम्मिलित संस्था जैसे बैंक, वित्तीय संस्था होती है जो एक निश्चित कमीशन के बदले जिसे अभिगोपन कमीशन कहते है




Underwriting Commission in Hindi
Underwriting Commission in Hindi





निर्दिष्ट अंशों एवं ऋणपत्रों को जो जनता द्वारा नही लिए जाते, खुद लेने का ठहराव करते है। इस ठहराव को अभिगोपन ठहराव कहते है।



अभिगोपन कमीशन का निम्नलिखित शर्तों के अधीन भुगतान किया जा सकता है :

1. ऐसे कमीशन का भुगतान कंपनी के अन्तर्नियमों के अंतर्गत अधिकृत होना चाहिए।


2. कमीशन की दर अंशों पर 5 प्रतिशत और ऋणपत्रों पर 2 1/2 या अन्तर्नियमों में दी गयी प्रतिशत, दोनों में जो भी कम हो, से अधिक नही होनी चाहिए।


3. कमीशन की दर या राशि प्रविवरण मे दिखाई गई होनी चाहिए।


4. प्रविवरण में अभिगोपको द्वारा अभिगोपित अंशों की संख्या भी लिखी होनी चाहिए।


5. प्रविवरण के साथ अभिगोपको के साथ हुए अनुबन्ध की एक प्रति भी रजिस्ट्रार के पास जमा की जानी चाहिए। अभिगोपन कमीशन अभिगोपको को कंपनी द्वारा इसलिए दिया जाता है क्योंकि वह कंपनी के निर्गमित अंशों के बिकने की गारंटी कर देते है और जिसके फलस्वरूप कंपनी का निर्गमन सफल हो पाता है।




अभिगोपन और व्यवस्था करना (Underwriting and Placing)

अभिगोपन तथा व्यवस्था करने में अंतर है। अभिगोपन समझौते में, अभिगोपक स्वीकार करता है कि अगर जनता को प्रस्तुत किए गए अंशो और ऋणपत्रों की एक निश्चित संख्या जनता नही लेगी तो वह खुद उन्हें ले लेगा और उनके लिए भुगतान कर देगा। लेकिन व्यवस्था करने के समझौते में एक व्यक्ति या फर्में कंपनी द्वारा देय कमीशन के बदले में कंपनी के अंश और ऋणपत्र खरीदने के लिए क्रेता ढूंढता है। जितने अंशों या ऋणपत्रों की व्यवस्था करने का समझौता है अगर उतने के क्रेता नही मिलते तो, अभिगोपक की तरह, वह खुद अंश या ऋणपत्र नही खरीदता। जितने अंशों और ऋणपत्रों के खरीददार वह ढूंढ पाएगा, उतनी राशि पर उसे कमीशन मिल जाएगा शेष पर नही।




दलाली (Brokerage)

दलाल ऐसे व्यक्ति होते है जो कि विक्रेता तथा क्रेता के बीच अनुबन्ध कराने में सहायता करते है। जनता द्वारा अंश न खरीदे जाने की स्थिति में दलाल खुद उन अंशों को खरीद लेने का अनुबन्ध नही करते। वे तो विक्रेता तथा क्रेता में बीच केवल एक मध्यस्थ के रूप में कार्य करते है। जितने अंशों का विक्रय कराने में वे सहायक होते है उतने अंशों पर उन्हें कमीशन दिया जाता है जिसे दलाली कहते है। अतः दलाली उस कमीशन को कहा जाता है जो व्यावसायिक दलालो, अंशों को दलालो, बैंकर्स आदि को उनकी सेवाओं को के बदले में दिया जाता है।

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